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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

"गीत-समय को हँसकर बिताओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

साज मौसम ने बजाया,
आज फिर कुछ गुनगुनाओ।
कुछ हमारी भी सुनो अब,
और कुछ अपनी सुनाओ।।

प्यार से बतिया रहीं हैं,
गेहूँ की सब बालियाँ,
झूमती इठला रही हैं,
पेड़ की सब डालियाँ,
ज़िन्दग़ी है चार दिन की,
समय को हँसकर बिताओ।
कुछ हमारी भी सुनो तुम,
और कुछ अपनी सुनाओ।।

झड़ गये हैं पात पीले,
आ गये पल्लव नये,
आम-जामुन-नीम पर भी,
बौर फिर से आ गये,
दे रही सन्देश कोयल,
साथ में खुशियाँ मनाओ।
कुछ हमारी भी सुनो तुम,
और कुछ अपनी सुनाओ।।

खिल उठा वीरान उपवन,
चहकता ऋतुराज आया,
भ्रमर करता आज गुंजन,
मस्त भँवरे को चमन में,
सुमन का है “रूप” भाया,
भर नवल उत्साह मन में,
नया सम्वत्सर मनाओ।
कुछ हमारी भी सुनो तुम,
और कुछ अपनी सुनाओ।। 

2 टिप्‍पणियां:

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