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मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

अग़ज़ल - "मुखरित अब अधिकार हो गये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रिश्ते-नाते, आपसदारी, कलयुग में व्यापार हो गये।
अपनी केसर की क्यारी में, क़ाब़िज़ अब मक्कार हो गये।।

असरदार हो गये किनारे, फिरते दर-दर, मारे-मारे,
खुद्दारी की माला जपते, माली अब गद्दार हो गये।।

मन्त्री-सन्त्री और विधायक, खुलेआम कानून तोड़ते,
दूध-दही की रखवाली में, बिल्ले पहरेदार हो गये।

नैतिक और अनैतिकता से, आय-आय कैसे भी आये,
घोटालों में लिप्त धुरन्धर, अब तो इज़्जतदार हो गये।।

अपने होठों को सी लेना, जनता की ये लाचारी है,
रोटी-रोजी के बदले में, भाषण लच्छेदार हो गये।

कहीं कीच में कमल खिला है, कहीं हाथ को राज मिला है,
मौन हो गये कर्म यहाँ पर, मुखरित अब अधिकार हो गये।

"रूप" न देखा, काम न देखा, चमक गयी किस्मत की रेखा,
कामी-कपटी लोकतन्त्र में, अब तो भागीदार हो गये।

3 टिप्‍पणियां:

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