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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

"धर्मान्तरण के कारण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

         आज से लगभग 37-38 वर्ष पुरानी बात है। उन दिनों मेरे गृह जनपद बिजनौैर (उत्तर प्रदेश)  के एक व्यक्ति खटीमा आकर बस गये। यहीं पर उन्होंने एक रिश्तेदार डाक्टर के यहाँ कुछ दिन रह कर डाक्टरी सीख ली और निकट के गाँव में अपना चिकित्साभ्यास शुरू कर दिया। गुजर-बसर ठीक-ठाक होने लगी।
         संयोग से उस गाँव में एक पादरी (ईसाई) परिवार भी रहता था। उसने इस व्यक्ति के यहाँ आना जाना शुरू कर दिया और नित्य प्रति वो पादरी इसे बाइबिल की बातें बताने लगा। यह डाक्टर भी उसकी बातें रस लेकर सुनने लगा।
        अब उस पादरी ने उसे किसी ईसाई सम्मेलन में ले जाने के लिए राजी कर लिया।
        चार-पाँच दिनों के बाद जब यह डाक्टर लौट कर अपने घर आया तो सिर से चोटी और कन्धे से जनेऊ गायब था। यह पूरी तरह ईसाइयत के रंग में रंग चुका था।
         अब इसने डाक्टरी का रजिस्ट्रेशन प्रमाण-पत्र फाड़ कर फेंक दिया था। इसका एक ही काम था गाँव-गाँव जाकर ईसाईयत के पर्चे बाँटना।
इसको इस काम के लिए उस समय तीन हजार रुपये प्रति माह मिलता था।
        आज इसने अपना मकान बना लिया है। दोनों पुत्रियों और पुत्र का विवाह भी ईसाई परिवारों में कर दिया है।
      वर्तमान समय में विदेशी ईसाई मिशन इसे दस हजार रुपये प्रति माह दे रहा है।
    अपने घर में यह हर रविवार (सन-डे) को दरबार लगाता है। आदिवासी लोगों के भूत-प्रेत को उतारने का ढोंग करता है। हजारों रुपये का चढ़ावा प्रति रविवार इसके घर पर आता है। अब तक यह सैकड़ों भोले-भाले आदिवासियों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर चुका है।
अब समझ में आ गया है कि ईसाई मिश्नरी हमारे देश के भोले-भाले निर्धन परिवार के लोगों को लोभ देकर ईसाई बनाते हैं।
      स्वार्थ और लोभ के कारण आज हमारे देश के कितने ही हिन्दुपरिवार ईसाई बन गये हैं। लेकिन वो अपना सरनेम और जाति का लबादा आज भी हिन्दु धर्म का ही ओढ़े हुए हैं। विडम्बना यह है कि ईसाई मूल के लोग तो आजकल धर्म परिवर्तन कम कराते हैं और लोभ तथा स्वार्थ के लिए धर्मान्तरण किए हुए लोग इस हरकत में अधिक संलग्न है। 
        धर्मनिरपेक्षता से आच्छादित हमारे देश की सरकार  इस प्रकरण पर मौन ही रहती है। क्योंकि लगभग सभी राजनीतिक दल वोटों की राजनीति करते हैं। उन्हे सिर्फ एक ही चिन्ता हमेशा रहती है कि कहीं उनका  वोट-बैंक न छिन जाये। 
       आज तो स्थति यह है कि दो और दो को मिलाकर चार गिनने से राजनेताओं को अपनी कुर्सी खिसकने की चिन्ता लगी रहती है। इसलिए वो हमेशा दो और दो को मिलाकर पाँच ही गिनते हुए पाये जाते हैं।
हमारे देश में धर्मान्तरण के मुख्य कारण- निर्धनता लोभ और स्वार्थ है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. धर्मान्तरण के मुख्य कारण- निर्धनता लोभ और स्वार्थ है।
    .बिलकुल सही बात है ........ इस दिशा में गंभीरता से विचार करना जरुरी है ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. भगवन कहते हैं- "स्वधर्मे निधनम् श्रेयः।"
    पर यहाँ तो केस उल्टा है..पैसा इंसान से कुछ भी करा सकता है।

    उत्तर देंहटाएं

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