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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

दोहे "जितना चाहूँ भूलना उतनी आती याद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तारतम्य टूटा हुआ, उलझ गये हैं तार।
जाने कब मिले पायेगा, शब्दों को आकार।।
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अब मेरे सिर पर नहीं, माँ का प्यारा हाथ।
माँ जब से है चल बसी, मैं हो गया अनाथ।।
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कदम-कदम पर घेरते, मुझको झंझावात।
समझ अकेला कर रहे, घात और प्रतिघात।।
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पलभर में ही हो गया, जीवन का निर्वाण।
माँ ने मेरी गोद मॆं, छोड़े अपने प्राण।।
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कहने को सँग-साथ में, पूरा है परिवार।
मगर न वो दे पायेंगे, माता जैसा प्यार।।
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माँ के जाने पर मुझे, गहरा है अवसाद।
जितना चाहूँ भूलना, उतनी आती याद।
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अजर-अमर है आत्मा, लेगी जन्म जरूर।
महकाना संसार को, जैसे गन्ध कपूर।।
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घी-सामग्री भार से, कहीं अधिक थी मात।
छः कुण्टल समिधाओं से, होम किया तव गात।।
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पूरी श्रद्धा से किये, माँ मैंने सब कर्म।
क्षमा मुझे करना अगर, भूला हूँ कुछ धर्म।।

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