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सोमवार, 20 अप्रैल 2015

दोहे-"होना पड़ता सभी को, कभी न कभी अनाथ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
सूना घर-आँगन पड़ा, सूना ही है द्वार।
माँ के बिन सूना हुआ, मेरा तो संसार।१।
 --
नहीं भुलाए भूलती, माता तेरी याद।
अब किससे मैं करूँगा, माँ सीधा सम्वाद।२।
 --
माँ ममता का “रूप” है, पिता सबल आधार।
मात-पिता सन्तान को, करते प्यार अपार।३।
 --
बातें माता-पिता की, सहता था चुपचाप।
मात-पिता को कभी भी, दिया नहीं सन्ताप।४।
 --
एक साल बीता नहीं, पिता गये परलोक।
अब माता भी चल बसी, छोड़ मृत्यु का लोक।५।
 --
दोनों के आशीष से, वंचित हूँ मैं आज।
तरस रहा हूँ आपकी, सुनने को आवाज़।६।
 --
जीवनभर मिलता नहीं, मात-पिता का साथ।
होना पड़ता सभी को, कभी न कभी अनाथ।७।

4 टिप्‍पणियां:

  1. निर्वात बनता है ऐसा जो भरना बहुत मुश्किल होता है ।

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  2. शास्त्री जी , माताजी से विछोह जीवन की वह क्षति है जो कभी पूरित नहीं हो सकती , लेकिन आप जैसे पुत्र को पाकर उनकी आत्मा भी बहुत शांतिपूर्वक परमधाम में आसीन होगी. धैर्य रखें और परिजनों को धैर्य रखने का साहस दें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. माता-पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता, सादर नमन.

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीवनभर मिलता नहीं, मात-पिता का साथ।
    होना पड़ता सभी को, कभी न कभी अनाथ।
    ..माँ बाप से बढ़ाकर संसार में कोई नहीं होता ...
    ..सच तो यही है की एक दिन सबको ही जाना है ..

    ..सादर नमन!

    उत्तर देंहटाएं

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