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रविवार, 26 अप्रैल 2015

दोहे "धरती और पहाड़ पर, है कुदरत की मार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वसुन्धरा कैसे सजे, भर सोलह सिंगार।
धरती और पहाड़ पर, है कुदरत की मार।।
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आदिकाल से चल रहा, कुदरत का यह खेल।
मानव सब कुछ जानकर, बोता विष की बेल।।
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सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
मांस नोचने के लिए, फिर मंडराये गिद्ध।।
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सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता का धन खा रहे, भरकर उजले भेष।।
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कैसे श्रद्धासुमन मैं, करूँ समर्पित आज।
ठोकर खाकर भी नहीं, सुधरा देश-समाज।।

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