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गुरुवार, 27 जुलाई 2017

दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म।
पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।।

हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश।
तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।।

तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त।
एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।।

सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज।
फिर से पाला बदल कर, बन बैठे अधिराज।।

जनमत की किसको यहाँ, रहती है परवाह।
राजनीति के मूल में, कुरसी की है चाह।।

2 टिप्‍पणियां:

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