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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

"तुकबन्दी मादक-उन्मादी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वाणी से खिलता है उपवन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
 
शब्दों को मन में उपजाओ
फिर इनसे कुछ वाक्य बनो
सन्देशों से फलता गुलशन
स्वर व्यञ्जन ही तो है जीवन

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
तुकबन्दी मादक-उन्मादी
बन्दी में होती आजादी 
सुख बरसाता रहता सावन 

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
आता नहीं बुढ़ापा जिसको
तुकबन्दी कहते हैं उसको
छाया रहता जिस पर यौवन

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
दुर्जन के प्रति भरा निरादर
महामान्य का करती आदर
तुकबन्दी से होता वन्दन

तुकबन्दी मनुहार-प्यार है
 यह महकता हुआ हार है
तुकबन्दी होती चन्दन-वन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

शायर की यह गीत–ग़ज़ल है
सरिताओं की यह कल-कल है
योगी-सन्यासी का आसन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

तुकबन्दी बिन जग है सूना
यही उदाहरण, यही नमूना
तुकबन्दी में है अपनापन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

तुकबन्दी बिन काव्य अधूरा
मज़ा नहीं मिलता है पूरा
तुकबन्दी से होता गायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

अगर शान से जीना चाहो
तुकबन्दी को ही अपनाओ
खोलो तो मुख का वातायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सारगर्भित, शुभकामनाएं.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन की एक अलग परिभाषा. बहुत खूब. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति जीवन की ,सुन्दर शब्द रचना आभार "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच है स्वर-व्यञ्जन के बिना शब्द नहीं बनते हैं, जिंदगी भी इसी की तरह है
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं

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