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शनिवार, 22 जुलाई 2017

प्रकाशन "दोहा दंगल में मेरे दोहे"

अमर शहीदों का कभी, मत करना अपमान।
किया इन्दोंने देशहित, अपना तन बलिदान।।

जीवन तो त्यौहार है, जानों इनका सार।
प्यार और मनुहार से, बाँटो कुछ उपहार।।

जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तौलना, पावन प्यार-दुलार।।

गौमाता से ही मिले, दूध-दही-नवनीत।
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।।

कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद।
खेतों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।।

कुटिया-महलों में जलें, जगमग-जगमग दीप।
सरिताओं के रेत में, मोती उगले सीप।।

पथ में मिलते रोज ही, भाँति-भाँति के लोग।
तब ही होती मित्रता, जब बनता संयोग।।

रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।

सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर।
मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।।

शिशुओं की किलकारियाँ, गूँजें सबके द्वार।
बेटा-बेटी में करो, समता का व्यवहार।।

चाहे कोई वार हो, कोई हो तारीख।
संस्कार देते हमें, कदम-कदम पर सीख।।

तोड़ रही दम सभ्यता, आहत हैं परिवेश।
पुस्तक तक सीमित हुए, सन्तों के सन्देश।।

झेल नहीं पाया मनुज, कभी समय का वार।
ज्ञानी-राजा-रंक भी, गये समय से हार।।

कभी रूप की धूप पर, मत करना अभिमान।
डरकर रहना समय से, समय बड़ा बलवान।।

सच्ची होती मापनी, झूठे सब अनुमान।
ताकत पर अपनी नहीं, करना कुछ अभिमान।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल ओछे लोग, ओछी टिप्पणियां करने लगे हैं जवानों पर।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अमर शहीदों के दम पर ही आज हम खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं लेकिन अफ़सोस कुछ लोग कभी नहीं समझ पाते हैं यह बात
    बहुत अच्छी प्रेरक रचना

    उत्तर देंहटाएं

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