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सोमवार, 24 जुलाई 2017

दोहे "तीजो का त्यौहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब पड़ती चौमास में, रिमझिम सुखद फुहार।।
तब आते बरसात में, तीज और त्यौहार।।
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हरी-भरी धरती हुई, उफन रहे हैं ताल।
उछल-कूद के साथ में, दादुर करें धमाल।।
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बरखा का जलपान कर, धान रहे लहराय।
चरागाह में चर रहे, घोड़े-खच्चर-गाय।।
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कुदरत के उपहार ये, लगते बहुत हसीन।
मखमल जैसी घास के, बिछे हुए कालीन।।
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घेवर लेकर आ गया, तीजो का त्यौहार।
घर-घर में झूले पड़े, झूल रहे नर-नार।।
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हाथों में मेंहदी रचा, पहन गले में हार।
तीजों पर तो नारियाँ, करती हैं सिंगार।।
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उपवन कानन-बाग में, बरस रहा है नूर।
कंटक पेड़ खजूर पर, फल लटके भरपूर।।
  

10 टिप्‍पणियां:

  1. दिनांक 25/07/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...

    उत्तर देंहटाएं
  2. परंपरा और संस्कृति की झलक दिखलाते दोहे.. . बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. तीज पे सुन्दर दोहे ... बधाई पर्व की ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर ....
    सावन और तीज त्यौहार पर मनभावन रचना..।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी सावनी रंगत लिए रचना

    उत्तर देंहटाएं

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