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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

दोहे "आयी है बरसात" (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बड़े दिनों के बाद में, आयी है बरसात।
उमड़-घुमड़कर श्यामघन, बरसे पूरी रात।।
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खेतों में पानी भरा, नाले हैं लबरेज।
रोपाई का धान की, काम हो गया तेज।।
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बारिश से भीगा बदन, बहुत दिनों के बाद।
अपनी नौका नदी में, लाये आज निषाद।।
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झरने झर-झर कर रहे, उफन रहे हैं ताल।
सरिताओं का हो रहा, रूप आज विकराल।।
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बया नीड़ से झाँकती, गर्दभ करते गान।
भारी बारिश से कहीं, दरक रही चट्टान।।
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रंग-बिरंगी छतरिया, ओढ़ रहे हैं लोग।
सिर ढकने के है लिए, छातों का उपयोग।।
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बालक कागज की बना, चला रहे हैं नाव।
जाती नौका उधर ही, होता जिधर बहाव।।
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कई साल के बाद में, बरस रहा आषाढ़।
जो निचले भू-भाग हैं, उनमें आयी बाढ़।।
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फिर से सूखे चमन में, आने लगी बहार।
सूखी पड़ी जमीन की, भरने लगीं दरार।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही लाजवाब.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह वाह हमेशा की तरह लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  3. बालक कागज की बना, चला रहे हैं नाव।
    जाती नौका उधर ही, होता जिधर बहाव।।
    बढ़िया अभिव्यक्ति है , मंगलकामनाएं आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही मनोरम ! प्रकृति का वर्णन ,लयबद्ध रचना ,सुन्दर

    आभार "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं

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