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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

बालकविता "नभ पर घटा घिरी है काली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सावन की है छटा निराली
धरती पर पसरी हरियाली

तन-मन सबका मोह रही है
नभ पर घटा घिरी है काली

मोर-मोरनी ने कानन में
नृत्य दिखाकर खुशी मना ली

सड़कों पर काँवड़ियों की भी
घूम रहीं टोली मतवाली

झूम-झूम लहराते पौधे
धानों पर छायीं हैं बाली

दाड़िम, सेब-नाशपाती के,
चेहरे पर छायी है लाली

लेकिन ऐसे में विरहिन का
उर-मन्दिर है खाली-खाली

प्रजातन्त्र के लोभी भँवरे
उपवन में खा रहे दलाली

कैसे निखरे "रूप" गुलों का
करते हैं मक्कारी माली 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर ,आभार। "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  3. धरती पर पसरी हरियाली तन-मन सबका मोह रही ।
    सच मे सावन की हरियाली प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार कर सबका मॉन मोह लेती है ।

    उत्तर देंहटाएं

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