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रविवार, 23 सितंबर 2018

दोहे "गजल हो गयी पास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वजन भजन में कम हुआ, गजल हो गयी पास।
भजन कहाँ लव-लीन की, बुझा सकेंगे प्यास।।

कुछ को दौलत का नशा, कोई मद में चूर।
आशिक होते हैं सदा, लोकलाज से दूर।।

लुभा रहा जसलीन को, मखमल का कालीन।
दौलत पाने के लिए, आतुर लव में लीन।।

झूठा प्यार-दुलार है,मतलब का है खेल।
जीवन जीने के लिए, चढ़ी पेड़ पर बेल।।

चाहे राम-रहीम हो, या हो वृद्ध अनूप।
मन को आकर्षित करे, नरम-गुनगुनी धूप।।

वैसा ही पाताल है, जैसा क्षितिज अनन्त।
कामी गिरता गर्त में, ऊपर उठता सन्त।।

सदियों से ही जगत में, पुण्य रहा है हार।
इसीलिए तो बढ़ रहा, निश-दिन पापाचार।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (24-09-2018) को "गजल हो गयी पास" (चर्चा अंक-3104) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. झूठा प्यार-दुलार है,मतलब का है खेल।
    जीवन जीने के लिए, चढ़ी पेड़ पर बेल।।
    ......पेड़ को सुखाकर ही छोड़ती है बेल
    बहुत सही

    उत्तर देंहटाएं

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