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शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

वन्दना के दोहे "पावन हो परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नमन आपको शारदे, मन के हरो विकार।
नूतन छन्दों का मुझे, दो अभिनव उपहार।।
--
तुक-लय-गति का है नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।
मेधावी मुझको करो, मैं मूरख नादान।।
--
सच्चे मन से आपका, करता हूँ मैं ध्यान।
शब्दों को पहनाइए, माँ निर्मल परिधान।।
--
गीत-ग़ज़ल-दोहे लिखूँ, लिखूँ बाल साहित्य।
माता मेरे सृजन में, भर देना लालित्य।।
--
लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।
पावन करना चित्त को, नहीं चाहिए वित्त।।
--
बैठक में अज्ञान की, पसरी हुई जमात।
विद्वानों को हाँकते, अब धनवान बलात।।
--
देवी हो माँ ज्ञान की, ऐसे करो उपाय।
साधक वीणापाणि के, कभी न हों असहाय।।
--
जगत गुरू बन जाय फिर, अपना प्यारा देश।।
वीणा की झंकार से, पावन हो परिवेश।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।

    पावन करना चित्त को, नहीं चाहिए वित्त।।

    न हम किया न करेंगे ,न किछु करे शरीर ,

    जो कुछ किया सो तुम किया ,हुआ कबीर कबीर।
    वंदना के स्वर तुम्हारे ,राग शब्द अउरु भाव सारे ,
    सब तुम्हारे सब तुम्हारे ,.....
    nanakjio.blogspot.com
    veerubhai1947.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं


  2. लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।

    पावन करना चित्त को, नहीं चाहिए वित्त।।

    न हम किया न करेंगे ,न किछु करे शरीर ,

    जो कुछ किया सो तुम किया ,हुआ कबीर कबीर।
    वंदना के स्वर तुम्हारे ,राग शब्द अउरु भाव सारे ,
    सब तुम्हारे सब तुम्हारे ,.....

    बे -जोड़ भाव गंगा शास्त्री जी अहम मुक्त भाव पूरित।
    nanakjio.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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