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सोमवार, 20 मई 2019

दोहे "आम दिलों में खास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आम पिलपिले हो भले, देते हैं आनन्द।
उन्हें चूसने में मिले, लोगों को मकरन्द।।
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निर्वाचन तक ही रहेंआम दिलों में खास।
लेकिन उसके बाद मेंआती पुनः खटास।।
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डाल-पाल के आम में, जब तक भरी मिठास।
तब तक रहती आम सेनातेदारी खास।।
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आम-खास के खेल में, आम गया है हार।
आम खास की कर रहा, सदियों से मनुहार।।
--
खाते-खाते आम कोलोग बन गये खास।
मगर आम की बात काकरते सब उपहास।।
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अमुआ अपने देश के, दुनिया में मशहूर।
लेकिन आज गरीब की, हुए पहुँच से दूर।।
--
मीठा-मीठा आम में, भरा हुआ है माल।
इसीलिए तो आम को, कहते लोग रसाल।।

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