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गुरुवार, 23 मई 2019

दोहे "बिकती नहीं तमीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।

वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में अब भी बहे, पतित-पावनी धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन नहीं विपक्ष की, नाव लग रही पार।।

कृपण बने खुद के लिए, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

रखना नहीं दिमाग में, राजनीति में मैल।
खटते रहना रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सासन जहँ कोल्हू किए जन जन भएँगे बैल |

    सासक सोंटी मार कै निकसावैगा तैल || १० ||

    भावार्थ : - शासन जहाँ कोल्हू के समान हो जाता है वहां फिर जनमानस वृषभ के सदृश्य हो जाती है | ऐसे शासन व्यवस्था में फिर शासक अपनी इच्छाचारिता की सोंटी से चोट देते उस वृषभ को श्रम से शिथिलीकृत अवस्था में भी उसका शोषण व् दोहन करता है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सासन जहँ कोल्हू किए जन जन भएँगे बैल |

    सासक सोंटी मार कै निकसावैगा तैल || १० ||

    भावार्थ : - शासन जहाँ कोल्हू के समान हो जाता है वहां फिर जनमानस वृषभ के सदृश्य हो जाती है | ऐसे शासन व्यवस्था में फिर शासक अपनी इच्छाचारिता की सोंटी से चोट देते उस वृषभ को श्रम से शिथिलीकृत अवस्था में भी उसका शोषण व् दोहन करता है |

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