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गुरुवार, 1 मई 2014

"ग़ज़ल-मन का कोई विमान नहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मंजिल तो मंजिल होती है, लेकिन ये आसान नहीं
जो मंजिल से डर जाये, वो कहलाता इंसान नहीं

चलने को तो सब चलते हैं, जीवन की पगडण्डी पर
लक्ष्य पकड़ना सभी चाहते, लेकिन पथ का ज्ञान नहीं

पर्वत की छाती को छाँटा, छैनी और हथौड़ों से
लेकिन भरता नहीं उडानें, मन का कोई विमान नहीं

कैसे सफर कटेगा बोलो, नीरसता-नीरवता में
होगी मृदुमुस्कान अगर, तो चेहरा होगा म्लान नहीं

अन्तहीन राहों पर चलते, ढल जाता है “रूप” मगर,
कई जन्म लेकर भी, पूरे होते हैं अरमान नहीं

3 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत रचना शास्त्रीजी इस हेतु आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. लक्ष्य-ज्ञान बिना ही तो भटक जाता है व्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो मंजिल से डर जाये ......... बिल्‍कुल सच

    उत्तर देंहटाएं

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