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शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

"चाँदनी का हमें “रूप” छलता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मखमली ख्वाब आँखों में पलता रहा।
मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

अश्क मोती बने मुस्कुराने लगे,
अनमने से सुमन खिलखिलाने लगे,
सुख सँवरता रहादर्द जलता रहा।
मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

तुम जो ओझल हुए, अटपटा सा लगा,
जब दिखाई दिये, चटपटा सा लगा,
ताप बढ़ता रहातन सुलगता रहा।
मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

उर के मन्दिर में ही प्रीत पलती सदा,
शैल-शिखरों से गंगा निकलती सदा,
स्वप्न मेरा हकीकत में ढलता रहा।
मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

आज फिर से सितारों भरा है गगन,
कितना निखरा हुआ, चन्द्रमा का बदन,
चाँदनी का हमें, रूप छलता रहा।
मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

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