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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

दोहे "शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास।
शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।।
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आज धरा पर लक्ष्मी, आने को तैयार।
शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।।
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पर्वों का पर्याय है, स्वयं कार्तिक मास।
सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।।
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दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार।
देता शुभसन्देश यह, पावस का त्यौहार।।
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चमक उठे हैं आज फिर, कोठी-महल-कुटीर।
नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।।

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