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मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

गज़ल "बेजुबानों में जुबानें आ गयीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सभ्यता बातें बनाने आ गयीं
दाग़ दामन में लगाने आ गयीं

पड़ गयीं जब पेट में दो रोटियाँ 
मस्जिदों में भी अजाने आ गयीं 

मन्दिरों में आरती होने लगीं
बेजुबानों में जुबानें आ गयीं

बस गयीं अब बीहड़ों में बस्तियाँ
चल के शहरों से दुकानें आ गयीं

कंकरीटों की फसल उगने लगीं
नस्ल नूतन कहर ढाने आ गयीं

“रूप” को पर्वत बदलने लग गये
नग्नता सूरत दिखाने आ गयीं

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