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गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

दोहे "अच्छी लगती घास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने भी सन्ताप हो, होती नहीं उदास।
नहीं हारना जानती, धरती की ये घास।।
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जीवन के संग्राम में, भरती नवउल्लास।
गणनायक के साथ में, पूजी जाती घास।।
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मान और अपमान का, नहीं मुखौटा पास।
चरणों में रहती सदा, कोमल-कोमल घास।।
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कुदरत के कालीन पर, करते लोग विलास।
धनवानों के लॉन में, मँहगी-मँहगी घास।।
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पता नहीं है किसी को, सही-सही इतिहास।
किसने दी सौगात में, धरती को ये घास।।
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जगतनियन्ता का हमें, होता है आभास।
आँगन में भी रंक के, उग आती है घास।।
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गरमी-सरदी में सदा, ओस बुझाती प्यास।
तुहिनकणों को धारती, अच्छी लगती घास।।
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निर्बल का मत कीजिए, कभी कहीं उपहास।
आँधी में-तूफान में, जीवित रहती घास।।
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दर्प नहीं करना कभी, बन जाओ जब खास।
शिक्षा देती है हमें, कदम-कदम पर घास।।

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