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शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

बालकविता "चन्दा मामा-सबका मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शरदपूर्णिमा जब-जब आती।
चमक चाँद की है बढ़ जाती।।


नभ में कैसा दमक रहा है।
 
चन्दा कितना चमक रहा है।।
यह नभ से अमृतटपकाता।
इसका सबको “रूप” सुहाता।।
 

कभी बड़ा मोटा हो जाता।
और कभी छोटा हो जाता।।

करवा-चौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।
 
महिलाएँ छत पर जाकर के।
इसको तकती हैं जी-भर के।।

यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।
 
जब भी बादल छा जाता है।
तब मयंक शरमा जाता है।।

लुका-छिपी का खेल दिखाता।
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।
 
धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।

सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।

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