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सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

दोहे "किये श्राद्ध निष्पन्न" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पूरे श्रद्धा-भाव से, किये श्राद्ध निष्पन्न।
पितृअमावस पर हुए, काम सभी सम्पन्न।।
--
अब आयेंगे सामने, माता के नवरूप।
निष्ठा से पूजन करो, लेकर दीपक-धूप।।
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सच्चे मन से कीजिए, माता का गुण-गान।
माता तो सन्तान का, ऱखती पल-पल ध्यान।।
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अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास।
करो प्रेम से आरती, रक्खो व्रत-उपवास।।
--
शुद्ध बनाने के लिए, आते हैं नवरात्र।
ज्ञानी बनने के लिए, पढ़ो नियम से शास्त्र।।

सारे सपनों को करें, माता जी साकार।
कर्मों से ही तो बने, जीवन का आधार।।
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ज्ञानदायिनी शारदे, भर दो खाली ताल।
वीणा की झंकार से, कर दो मुझे निहाल।।

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