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रविवार, 11 अक्तूबर 2015

दोहे "बिगड़ गया परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

थोड़े से माली रहे, आज चमन को सींच।
लेकिन कुछ लालित्य का, चीर रहे हैं खींच।।
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उपवन में चलता नहीं, गुणा-भाग का जोड़।
लेकिन फिर भी कर रहे, इनमें तोड़-मरोड़।।
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बिना अध्ययन कर रहे, मनमानी कुछ लोग।
नियमों की अवहेलना, हुआ भयंकर रोग।।
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योगदान जिसका नहीं, माँगें वही हिसाब।
इसीलिए तो हो रहे, दूषित सब तालाब।।
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सूख गया पनी यहाँ, बची हुई है कीच।
 मतलब के संसार में, लोग हो गये नीच।।
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रोटी-रोज़ी के लिए, पढ़े-लिखे मुहताज़।
धूर्त और मक्कार के, लिए बने है ताज़।।
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अमर शहीदों को यहाँ, भूल गये हैं लोग।
मनचाहे ढँग से रहे, आजादी को भोग।।
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प्यार और सदभाव के, थोथे हैं सन्देश।
दाँव-पेंच के खेल में, बिगड़ गया परिवेश।। 

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