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बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

"तन्त्र अब खटक रहा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

कंस हो गये कृष्ण आज,
मक्कारी से चल रहा काज,
भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,
महिलाओं की लुट रही लाज,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

जहाँ कमाई हो हराम की
लूट वहाँ है राम नाम की,
महफिल सजती सिर्फ जाम की
बोली लगती जहाँ चाम की,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

जहरीली बह रही गन्ध है,
जनता की आवाज मन्द है,
कारा में सच्चाई बन्द है,
गीतों में अब नहीं छन्द है,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

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