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बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

"पाँच मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जानते हैं सच, तभी तो मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें हम, कौन हैं वो।
जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।
--
दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
आग के बिन धुँआ नहीं होता।२।
--
उनकी सौगात बहुत दूर गई,
अब तो हर बात बहुत दूर गई।
रौशनी होगी नहीं तारों से-
चाँदनी रात बहुत दूर गई।३।
--
कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से-
कोई आया था फासले करने।४।
--
इतनी मजबूत राह थी पाई,
एक बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।

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