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गुरुवार, 24 नवंबर 2016

"हर इक कदम पर भरे पेंच-औ-खम हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ये माना कि ग़म में हुई चश्म नम हैं,
मगर दिल-जिगर में बहुत जोर-दम हैं।

भरोसा हमें अपने जज़्बात पर है,
मगर उनको एतबार अपने पे कम हैं।

अन्धेरों-उजालों भरी जिन्दगी में,
हर इक कदम पर भरे पेंच-औ-खम हैं।

हमें दर्द पीने की आदत है जानम,
दुनिया में हम जैसे लाखों सनम हैं।

समाया हुआ “रूप” दिलवर का दिल में,
सितारों के किस्मत में लिक्खे सितम हैं।

1 टिप्पणी:

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