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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

दोहे "कोल्हू के हैं बैल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जनसेवा के नाम पर, मन में पसरा मैल।
निर्धन श्रमिक-किसान तो, कोल्हू के हैं बैल।।
--
छँटे हुए सब नगर के, बन बैठे गुणवान।  
पत्रकारिता में बचे, कम ही अब विद्वान।।
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जो समाज की नजर में, कभी रहे बेकार।
वो अब अपने देश में, चला रहे अखबार।।
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पत्रकारिता में हुआ, गोल आज किरदार।
विज्ञापन के नाम पर, चमड़ी रहे उतार।।
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नाजायज जायज बना, करते रकम वसूल।
आय-आय के नाम पर, बिकते आज उसूल।।
--
बैतरणी में नरक की, कोई नहीं अनाथ।
राजनीति की मीन पर, मगरमच्छ का हाथ।।
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छुटभइये हों या बड़े, सबकी है अब मौज।
बढ़ती जाती देश में, बाबाओं की फौज।।



2 टिप्‍पणियां:

  1. बैतरणी में नरक की, कोई नहीं अनाथ।
    राजनीति की मीन पर, मगरमच्छ का हाथ।।
    --
    छुटभइये हों या बड़े, सबकी है अब मौज।
    बढ़ती जाती देश में, बाबाओं की फौज।

    ...इनसे ही तो देश चल रहा है ..क्या कहें और किससे कहें!!

    सार्थक सामयिक चिंतन प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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