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गुरुवार, 17 नवंबर 2016

ग़ज़ल "प्रारब्ध है सोया हुआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Image result for नोट  से परेशान जनता
 नीड़ में सबके यहाँ प्रारब्ध है सोया हुआ
काटते उसकी फसल जो बीज था बोया हुआ

खोलकर गठरी न देखी, दूसरों की खोलता
गन्ध को है खोजता, मूरख हिरण खोया हुआ

कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ

अब तो माली ही वतन का खाद-पानी खा रहे 
इस लिए आता नज़र सुरभित सुमन रोया हुआ

खोट ने पॉलिश लगाकर "रूप" कंचन का धरा
पुण्य ने बनकर श्रमिक अब, पाप को ढोया हुआ

2 टिप्‍पणियां:

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