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मंगलवार, 29 नवंबर 2016

गीत "कवि लिखने से डरता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

घर-आँगन-कानन में जाकर,
मैं तुकबन्दी करता हूँ।
अनुभावों का अनुगायक हूँ,
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।

है नहीं मापनी का गुनिया,
अब तो अतुकान्त लिखे दुनिया।
असमंजस में हैं सब बालक,
क्या याद करे इनको मुनिया।
मैं बन करके पागल कोकिल,
कोरे पन्नों को भरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।

आयुक्त फिरें मारे-मारे,
उन्मुक्त हुए बन्धन सारे।
जीवन उपवन के शब्दों में,
अब तुप्त हो गये बंजारे।
पतझर की मारी बगिया में,
मैं सुमन सुगन्धित झरता हूँ।
 मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।

दे पन्त-निराला की मिसाल,
चौकीदारी करते विडाल।
निर्मल कैसे अब नीर रहे,
कचरा गंगा में रहे डाल।
मिलते हैं मोती बगुलों को,
मैं घास-पात को चरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. "मिलते हैं मोती बगुलों को,
    मैं घास-पात को चरता हूँ"

    उत्तर देंहटाएं
  2. हा हा बहुत सुन्दर । डरिये मत लिखते रहिये । अतुकांत की आयू कम होती है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. मिलते हैं मोती बगुलों को,
    मैं घास-पात को चरता हूँ।
    मैं कवि लिखने से डरता हूँ
    ..देर ही सही लेकिन समय आने पर सब जानते हैं किसकी क़द्र कितनी है ....
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. waah bahut sundar pic bhi bahut sundar hai rachna bhi ....bahut khoob badhai

    उत्तर देंहटाएं

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