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बुधवार, 23 नवंबर 2016

दोहे "मुख हैं सबके म्लान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बादल नभ में है नहीं, उड़ती जाती धूल।
पानी बिन मुरझा रहे, उपवन के सब फूल।।
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पैसा घर में है नहीं, मुख हैं सबके म्लान।
दुखी देश में हो रहे, छोटे बड़े किसान।।
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जिनके बेटी है नहीं, वो क्या जाने दर्द।
दयाहीन शासक हुआ, कौन बने हमदर्द।।
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अब तो अपने देश में, हुए विकट हालात।
नोट नहीं हैं बैंक में, बिगड़ गयी है बात।।
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दो हजार के नोट को, पाना है आसान।
छुट्टा तो मिलता नहीं, लोग हुए हलकान।
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सम्यक् छोटे नोट से, खाली था जब कोष।
बिना विचारे क्यों किया, फिर ऐसा उद्+घोष।।
--
जनमत के इस ऐप का, समझ न आया सत्य।
क्या जनता की राय पर, वापिस लोगे कृत्य।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.11.2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2536 पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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