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शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

दोहे "धधक रही है आग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

माँ-बहनों के लाडले, सजनी के सिन्दूर।
रखवाले अब हो गये, भारत माँ से दूर।

भाषण तक सीमित ने हों, भीषण-भाषणवीर।
जन-गण अब यह चाहता, नेता हों प्रणवीर।।

जन-जन में प्रतिशोध की, धधक रही है आग।
कब बैरी के खून से, खेलोगे तुम फाग।।

दिखा दीजिए जगत को, अपना आज वजूद।
पापी पाकिस्तान को, करो नेस्त-नाबूद।।

सीमा पर बिन युद्ध के, मरते हों जब वीर।
शासक अब संग्राम की, करो ठोस तदबीर।।

मोदी पापी पाक को, कभी न करना माफ।
कर दो ऐसे देश को, नक्शे पर से साफ।। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. नमन वीर शहीदों को
    विनम्र श्रद्धांजलि

    जवाब देंहटाएं
  2. सुन्दर दोहे |बहुत अच्छा लगा आदरणीय आपने नेताओं को आगे आने को कहा |यही आह्वान हो हर भारतीय का |नमन
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. मेरी वुनाम्र श्रधांजलि है वीर सैनिकों को ...

    जवाब देंहटाएं

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