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सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

दोहे "अढ़सठ आज बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन में से घट गया, एक सुहाना साल।
क्या खोया क्या पा लिया, करता हूँ पड़ताल।।
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मना रहा है जन्मदिन, मेरा कुल परिवार।
अपने-अपने ढंग से, लाये सब उपहार।।
--
जीवन-साथी चल रहा, थाम हाथ में हाथ।
चार दशक से अधिक से, हम दोनों हैं साथ।।
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धीरे-धीरे कट गये, यूँ ही अढ़सठ साल।
प्यार और तकरार में, हुआ न कभी बबाल।।
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होते घर-परिवार में, कभी-कभी मतभेद।
किन्तु न होने चाहिएँ, आपस में मनभेद।
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सुख सरिता में हो सदा, सीधा-सरल बहाव।
पार करे भवसिन्धु को, जीवन की ये नाव।।
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ज्यादातर तो कट गयी, थोड़ी है अवशेष।
गुज़र जाय वो शान से, जितनी भी है शेष।।
--
जगतनियन्ता आपसे, इतना है अनुरोध।
जब तक इस जग में रहूँ, रखना मुझे सुबोध।।
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होते बढ़ती उमर में, शिथिल सभी के अंग।
मेधा मेरे भाल से, कभी न करना भंग।।
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ईश सदा करना कृपा, लगे न कोई रोग।
अन्तसमय तक अंग सब, मेरे रहें निरोग।।
--
बीत गये सुख के यहाँ, अढ़सठ आज बसन्त।
देने को शुभकामना, आये हैं श्रीमन्त।।
--
दिल से निकली भावना, है सच्चा उपहार।
जन्मदिवस पर सभी का, करता हूँ आभार।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना
    अड़सठवें वसंत पर बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति
    यूँ ही आपका जीवन सुखद बना रहे इन्हीं हार्दिक कामनाओं सहित
    सादर !

    जवाब देंहटाएं
  2. जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ सर आपको...सदा निरोग रहकर दीर्घायु हों...सपरिवार आनंद से रहे यही कामना है।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय सर जन्मदिन मुबारक हो | सपरिवार खुश और खुशहाल रहें यही दुआ और कामना है | सादर --

    जवाब देंहटाएं

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