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बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

दोहे "विश्व प्रणय सप्ताह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बारिश-कुहरे से घिरा, पूरा उत्तर देश।
नहीं बना मधुमास में, बासन्ती परिवेश।।

नभ आँसू टपका रहा, सहमे रस्म-रिवाज।
बहुत विलम्बित हो रहा, ऐसे में ऋतुराज।।

लौट-लौट कर आ रहा, हाड़ कँपाता शीत।
मौसम ने छेड़ा नहीं, मनभावन संगीत।।

शुरू हो रहा आज से, विश्व प्रणय सप्ताह।
लेकिन मौसम कर रहा, सब अरमान तबाह।।

प्रणय-निवेदन के लिए, मौसम है प्रतिकूल।
उपवन में अब तक नहीं, खिले बसन्ती फूल।।

सरसों फूली ही नहीं, हरे-हरे सब खेत।
सुमनों बिन सूने पड़े, अब भी हृदय-निकेत।।

पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार।
प्रणय-दिवस के बाद में, हो जाती तकरार।।




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