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सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

दोहे "जग में अन्तरजाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नूतन आविष्कार ने, कैसा किया कमाल।
गाँव-गाँव में सुलभ है, अब तो अन्तरजाल।।

कब किसको क्या चाहिए, सबका रखता ख्याल।
संचित अन्तरजाल पर, सभी तरह का माल।।

मिलते अन्तरजाल पर, सभी तरह के चित्र।
रुचियों के अनुसार ही, यहाँ बनाओ मित्र।।

रोज फेसबुक-ब्लॉग पर, लिक्खो नवल विचार।
बात-चीत का आजकल, नेट सबल आधार।।

ब्लॉग-फेसबुक में भरा, भावों का मकरन्द।
पढ़ने-लिखने में जहाँ, मिल जाता आनन्द।।

मेल-व्हाट्सप ने किया, काम बहुत आसान।
बिना चिट्ठियों के हुए, पत्रालय सुनसान।।

मोती माणिक युक्त है, गहरा सागर ताल।
नवयुग का भगवान है, जग में अन्तरजाल।।

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