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बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

दोहे "प्रेमदिवस का खेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


प्रेमदिवस पर आ गये, युगल आज नज़दीक।
सागर तट पर देखिएलगे चहकने बीच।१।
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तोता-तोती पर चढ़ाप्रेम-दिवस का रंग।
दोनों ही सहला रहेइक-दूजे के अंग।२।
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प्रेम दिवस में हो रहाखेल बहुत संगीन।
शब्द-ज़ाल में फँस गईनाजुक उम्र हसीन।३।
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नादानी में भूल सेकभी न करना प्यार।
बुरे-भले को सोचलो, फिर करना इकरार।४।
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प्रेम दिवस पर लीजिएजीवन में व्रत धार।
प्रतिदिन पल-पल कीजिएसच्चा-सच्चा प्यार।‍‍‍५।
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चहक रहे हैं बाग मेंकलियाँ-सुमन अनेक।
धीरज और विवेक सेचुनना केवल एक।६।
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कंकड़-काँटों से भरीनहीं राह अनुकूल।
लेकर प्रीत कुदाल कोसभी हटाना शूल।७।
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मन-विचार मिल जाय जबसमझो तभी बसन्त।
मास-दिवस मधुमास हैसमझो आदि न अन्त।८।
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सुख सरिता बहती रहेधार न हो अवरुद्ध।
निशि-दिन प्रेम प्रवाह सेइसको करो समृद्ध।९।
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दिल से मत तजना कभीप्रीत-रीत उद्गार।
सारस से लो सीख तुमक्या होता है प्यार।१०।
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चिकनी-चुपड़ी देखकर,मत टपकाओ लार।
सोच-समझकर ही सदादेना कुछ उपहार।११।
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पश्चिम की है सभ्यताप्रेमदिवस का वार।
लेकिन अपने देश मेंप्रतिदिन प्रेम अपार।१२।
--
जीवनभर जो अमिट होबरसाओ वह रंग।
सिखलाओ संसार कोप्रेम-प्रीत के ढंग।१३।
--
आडम्बर से युक्त हैप्रेमदिवस का खेल।
चमक-दमक में खो गयाअब सुमनों का मेल।१४।

1 टिप्पणी:

  1. @जीवनभर जो अमिट हो, बरसाओ वह रंग। सिखलाओ संसार को, प्रेम-प्रीत के ढंग........होना तो यही चाहिए

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