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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

गीत "दूषित हुआ वातावरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।
सभ्यताशालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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2 टिप्‍पणियां:

  1. ... बहुत ही यथार्थ परक रचना वर्तमान परिस्थितियों को ताक पर रखकर कवि की व्याकुल मन की व्यथा का बहुत सुंदर प्रदर्शन आपकी कविता में नजर आ रही...👌है.. कुछ ऐसे ही परिस्थितियों में हम सबों का जीवन व्यतीत हो रहा है इतनी शानदार रचना के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (२० -१०-२०१९ ) को " बस करो..!! "(चर्चा अंक- ३४९४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं

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