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मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

गीत "बिन आँखों के जग सूना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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आशा और निराशा की जो,
पढ़ लेते हैं सारी भाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।
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दुख के बादल आते ही ये,
खारे जल को हैं बरसाते।
सुख का जब अनुभव होता है,
तब ये फूले नहीं समाते।
सरल बहुत हैं-चंचल भी हैं,
इनके भीतर भरी पिपासा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।
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कुछ में होती है खुद्दारी,
कुछ में होती है मक्कारी।
कुछ ऐसी भी आँखें होती,
जिनमें होती है गद्दारी।
ऐसी बे-ग़ैरत आँखों से,
मन में होती बहुत हताशा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।
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दुनिया भर की सरिताओं का,
इसमें आकर पानी ठहरा।
लहर-लहरकर लहरें उठतीं,
ये भावों का सागर गहरा।
बिन आँखों के जग सूना है,
ये जीवन की हैं अभिलाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. दो नयनों में ही होती हैं,
    दुनिया की पूरी परिभाषा

    बहुत ही सुंदर सर ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर आदरणीय आंखों पर मनमुग्ध करता काव्य ।

    जवाब देंहटाएं

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