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बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

ग़ज़ल "‘रूप’ की महताब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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भावनाओं का अचानक भर गया तालाब है
देशभक्ति का वतन में आ गया सैलाब है
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अब खुशी पसरी हुई दीवारों दर चहके हुए
जगमगाते हैं मिनारें सज गयी मेहराब है
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मानता लोहा हमारा आज सारा ही जहाँ
अपने हुनर की देश में कारीगरी नायाब है
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देखकर ऐसी बुलन्दी बहुत सदमा है वहाँ
दुश्मनों को तो हमारे लग गया जुल्लाब है
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सिंध और पख्तून के बदले हुए सुर लग रहे
अब पड़ोसी देश में सुलगा हुआ पंजाब है
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दहशतों के साये में जनता जहाँ पर जी रही
भीख में मिलता नहीं संसार में अलकाब है
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अब चिरागों में नहीं बाकी बचा कुछ तेल है
रौशनी देती नहीं अब रूप की महताब है
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2 टिप्‍पणियां:

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