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शनिवार, 2 जनवरी 2021

दोहे "कुहरे की सौगात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नभ पर छायी है घटा
, ठिठुर रहा है गात।
नये साल के साथ में, कुहरे की सौगात।१।
--
कुहरा आफत बन गया, बदले जीवन ढंग।
अच्छे दिन की आस में, छन्द हुए बेरंग।२।
--
सड़कों पर सैलाब था, भूखा था मजदूर।
हुआ पुराने साल में, जन-मानस मजबूर।३।
--
बर्फ पहाड़ों पर गिरी, मौसम की है मार।
सड़कें भी सुनसान है, बन्द पड़े बाज़ार।४।
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कोरोना के साथ में, गया पुराना वर्ष।
नये-नये इस वर्ष में, कब आयेगा हर्ष।५।
--
मन से था स्वागत किया, तेरा नूतन साल।
बदलेंगे हालात कब, सुधरेंगे कब हाल।६।
--
गेंहूँ के बिरुए करें, अपनी करुण पुकार।
मालिक अब मत दीजिए, हमको ये उपहार।७।
--
आशाएँ हैं बलवती, मन में है विश्वास।
कृष्ण पक्ष के बाद में, होगी धवल उजास।८।

--

6 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय,
    सादर नमन 🙏🏻

    गेंहूँ के बिरुए करें, अपनी करुण पुकार।
    मालिक अब मत दीजिए, हमको ये उपहार।

    बहुत ही हृदयस्पर्शी दोहा....
    गेहूं के बिरुए का मानवीकरण अत्यंत प्रभावशाली है।
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  2. आशाएँ हैं बलवती, मन में है विश्वास।
    कृष्ण पक्ष के बाद में, होगी धवल उजास।

    –आशाएँ फलित हों
    –असीम शुभकामनाओं के संग वन्दन

    जवाब देंहटाएं
  3. समसामयिक शानदार रचना।
    आपको नवबर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं, शास्त्री जी🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन दोहे आदरणीय 🙏
    नववर्ष आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय और सुख-समृद्धि दायक हो 🙏

    जवाब देंहटाएं
  5. कृष्ण पक्ष के बाद में होगी धवल उजास" बहुत सुंदर प्रेरक रचना! साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत बहुत सार्थक समय काल का सुंदर सृजन।
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय आपको समस्त परिवार जनों के साथ।

    जवाब देंहटाएं

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