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रविवार, 3 जनवरी 2021

दोहे "मौसम करे बवाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बादल नभ में छा गये, शुरू हुई बरसात।
अन्धकार ऐसा हुआ, जैसे श्यामल रात।।
--
अकस्मात सरदी बढ़ी, मौसम करे बवाल।
पर्वत के भूभाग में, जीना हुआ मुहाल।।
--
पर्वत पर दिनभर हुआ, खूब आज हिमपात।
किट-किट बजते दाँत हैं, ठिठुर रहा है गात।।
--
मैदानी भू-भाग पर, सर्दी में बरसात।
तेज हवाएँ बाँटती, जाड़े की सौगात।।
--
सूरज नभ में है नहीं, खिली नहीं है धूप।
कम्बल चादर ओढ़कर, लोग पी रहे सूप।।
--
धूल-धुन्ध सब धुल गयी, निर्मल है परिवेश।
सारे जग से अलग है, अपना भारत देश।।
--
दूध नहीं अच्छा लगे, अच्छी लगती चाय।
जाड़ा अब लिखने लगा, नये-नये अध्याय।।
--

10 टिप्‍पणियां:

  1. प्रणाम शास्त्री जी, क्या खूब ल‍िखे हैं दोहे सर्दी और ठ‍िठुरन को बयां करते क‍ि ---

    पर्वत पर दिनभर हुआ, खूब आज हिमपात।
    किट-किट बजते दाँत हैं, ठिठुर रहा है गात।।
    --
    मैदानी भू-भाग पर, सर्दी में बरसात।
    तेज हवाएँ बाँटती, जाड़े की सौगात।।

    जवाब देंहटाएं
  2. मैदानी भू-भाग पर, सर्दी में बरसात।
    तेज हवाएँ बाँटती, जाड़े की सौगात।।
    --
    सूरज नभ में है नहीं, खिली नहीं है धूप।
    कम्बल चादर ओढ़कर, लोग पी रहे सूप।।
    अत्यंत सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(०४-०१-२०२१) को 'उम्मीद कायम है'(चर्चा अंक-३९३६ ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. मंत्रमुग्ध करती प्रभावशाली लेखन व अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर दोहे। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. दूध नहीं अच्छा लगे, अच्छी लगती चाय।
    जाड़ा अब लिखने लगा, नये-नये अध्याय।।


    आदरणीय शास्त्री जी,
    बिलकुल दिल की बात बयां कर दी है आपने इस दोहे में 😀
    नायाब दोहे हैं सभी... साधुवाद 🙏

    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत खूब, समसामयिक रचना, शास्त्री जी।

    जवाब देंहटाएं
  8. वाह ! मौसम की जादूगरी को बयान करते सुंदर दोहे

    जवाब देंहटाएं

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