"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 11 मई 2014

"मातृ दिवस के अवसर पर...संस्मरण" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मातृ दिवस के अवसर पर...
    बात पचास साल पुरानी है हमारे पड़ोस में एक वृद्ध महिला रहती थी। जिसको पूरा मुहल्ला अम्मा के नाम से पुकारता था।
    उन दिनों हमने एक गइया पाली हुई थी। घर में हम लोग सुबह गुड़ के साथ मट्ठा पी लिया करते थे। और माता जी उसके लिए घास लेने चली जातीं थी। उस समय मेरी अवस्था 13 साल की थी। बाल मन था अतः मन में विचार आया कि माता जी के आने से पहले क्यों न कढ़ी और चावल बना लिया जाये।
   बस फिर क्या था मैंने जितनी समझ थी उसके अनुसार अपना काम शुरू कर दिया। और कढ़ी में छौंक लगा दिया। तभी वो वृद्ध महिला जिसको हम अम्मा कहा करते थे उधर से गुजरी और और बड़े कौतूहल से मेरे क्रिया-कलापों को देखने लगी। अब मुझे क्या पता था कि कढ़ी में कितना बेसन घोलना चाहिए?
   अम्मा ने मुझे कहा- रूपचन्द बेटा क्या कर रहा है?”
   मैंने कहा- अम्मा कढ़ी बना रहा हूँ।
      अम्मा ने जब चमचा कढ़ाई में चला कर देखा तो हँसने लगी और बोली बेटा कब तक पकायेगा इस पानी को। इसमें बेसन तो बहुत कम डाला है तूने।
    मैंने कहा- अम्मा मुझे क्या पता कि कितना बेसन डालते हैं।
तब अम्मा ने कहा- तू अब पास में मेरे पास में बैठकर देखता जा। मैं तुझे सिखाती हूँ कढ़ी बनाना।
    अम्मा ने कुछ बेसन और घोलकर कढ़ाई में मिला दिया। आधे घंटे में कढ़ी बन गयी तब अम्मा ने चावल बीन कर चावल भी पका दिये और बड़े प्यार से मुझे खाना खिलाया।
    आज मैं जब भी कढ़ी-चावल बनाता हूँ तो बरबस ही अम्मा की याद आ जाती है।
    ऐसा नहीं कि अम्मा सिर्फ मेरी ही मदद करती थी। वो तो पूरे मुहल्ले में सबकी मदद करती थी।
    मट्ठे में रोटी मलकर गली के कुत्ते खिलाना तो उसका रोज का काम था। इस काम में उसके पति कन्हैया दादा उसकी भरपूर मदद करते थे।
    मैंने अम्मा को अपने जीवन काल में कभी क्रोधित होते हुए नहीं देखा था। लेकिन उस रोज तो कमाल ही हो गया। जब एक मनचला एक जवान लड़की पर फब्तियाँ कस रहा था।
   अम्मा से रहा न गया और अपनी छड़ी से उसने मनचले की पिटायी कर दी।
    उसका नाम तो हरदेई था मगर वो वाकई में सबकी अम्मा थी।
मातृदिवस के अवसर पर मैं उस ममतामयी माँ को प्रणाम करता हूँ।
जो बच्चों को जीवन के, कर्म सदा सिखलाती है।
ममता जिसके भीतर होती, माता वही कहाती है।।"
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

6 टिप्‍पणियां:

  1. अम्मा के संस्कारों का जादू ही तो अम्मा है काश वैसी ही संतानें होवें

    उत्तर देंहटाएं
  2. अम्मा के संस्कारों का जादू ही तो अम्मा है काश वैसी ही संतानें होवें

    उत्तर देंहटाएं
  3. रोचक संस्मरण !
    सच है! जिसमें ममता होती है वही तो माँ कहलाती है ...

    ~सादर
    अनिता ललित

    उत्तर देंहटाएं
  4. माँ का स्नेह और ममता मन को सुकून से भर देती है..सुंदर संस्मरण !

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails