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शुक्रवार, 30 मई 2014

"ग़ज़ल-मुहब्बत कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, इनायत कौन करता है

7 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा व प्रेरक रचना , आदरणीय बहुत ही बढ़िया , नत्मस्तक ! धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी गज़लों का जवाब नही। पढता हूँ गुनता हूँ लेकिन गुणगान करने से झिझकता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 02/06/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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    उत्तर देंहटाएं
  4. खूबसूरत ग़ज़ल शास्त्रीजी ,आभार

    उत्तर देंहटाएं

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