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शुक्रवार, 9 मई 2014

"ग़ज़ल-आज के परिवेश में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलबी सब हो गये हैंआज के परिवेश में
अज़नबी से हो गये हैंमज़हबी आवेश में

आदमी को प्यार का, सन्देश अब कैसे मिले
आ रही है स्वार्थ की बू, सन्त के उपदेश में

रहबरों को आज, अपने मुल्क की चिन्ता नहीं
हो गये जनतन्त्र के सुर , बेसुरे अब देश में

नाम जनसेवक मगर, कुछ भाव सेवा का नहीं
लूटकर धन वतन का, करता जमा परदेश में

“रूप” तो अपना पुराना, खो गया जाने कहाँ
सार खोकर सार को अब खोजते अवशेष में

3 टिप्‍पणियां:

  1. ……। हो गये जनतन्त्र के सुर , बेसुरे अब देश में.…।
    बहुत सुन्दर शास्त्री जी,आपने सारी हकीकत बयां कर दी है

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज के परिवेश पर सम्पूर्ण दृष्टि !

    उत्तर देंहटाएं

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