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शुक्रवार, 2 मई 2014

"अमलतास के पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

तपती हुई दुपहरी में, झूमर जैसे लहराते हैं।
कंचन जैसा रूप दिखाते, अमलतास भा जाते हैं।।
जब सूरज झुलसाता तन को, आग बरसती है भू पर।
ये छाया को सरसाते हैं, आकुल राही के ऊपर।।

स्टेशन और सड़क किनारे, कड़ी धूप को सहते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खा कर, खुलकर हँसते रहते हैं।।


शाखाओं पर बैठ परिन्दे, मन ही मन हर्षाते हैं।
इनके पीले-पीले गहने, उनको बहुत लुभाते हैं।।

दुख में कैसे मुस्काते हैं, ये जग को बतलाते हैं।
सहना सच्चा गहना होता है, सीख यही सिखलाते हैं।।

5 टिप्‍पणियां:

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