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मंगलवार, 10 जून 2014

"गीत-प्यार के चार पल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरा एक पुराना गीत
अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में अब गजल।।

गन्ध से अब, सुमन की-सुमन है डरा
भाई-चारे में, कितना जहर है भरा,
वैद्य ऐसे कहाँ, जो पिलायें सुधा,
अब तो हर मर्ज की है दवा ही अजल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में अब गजल।।

धर्म की कैद में, कर्म है अध-मरा,
हो गयी है प्रदूषित, हमारी धरा,
ताल में पंक होना अलग बात है,
अब तो दूषित हुआ जा रहा गंग-जल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में अब गजल।।

आम, जामुन जले जा रहे, आग में,
विष के पादप पनपने लगे बाग मे,
आज बारूद के, ढेर पर बैठ कर,
ढूँढते हैं सभी, प्यार के चार पल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में अब गजल।।

आओ! शंकर-दयानन्द विष-पान को,
शिव अभयदान दो, आज इन्सान को,
जग की यह दुर्गति देखकर, हे प्रभो!
नेत्र मेरे हुए जार रहे हैं सजल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में अब गजल।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद खुबसूरत गीत ......... सर क्या हम इस गीत को अपने fb के पेज पर शेयर कर सकते हैं ??

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर ग़ज़ल , हर शब्द सुंदर ! आदरणीय उम्दा रचना , धन्यवाद !
    || जय श्री हरिः ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. अति सुन्दर...खूबसूरत कथ्य...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहद सुन्दर !!!

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अरे शास्त्री जी आप तो ऐसे न थे, मतलब कि आप की गज़लें आशावादी होती हैं यह निराशा क्यूँ।

    उत्तर देंहटाएं

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