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सोमवार, 30 जून 2014

"सूरज से आग बरसती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

   
नदिया-नाले सूख रहे हैंजलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी केव्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम मेंसूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने कोधरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डीमेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके सेये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआबादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नहीक्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्यामसुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

5 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह सुंदर प्रस्तुति ।

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  2. काले मेघा अब तो बरसो...सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर रचना व प्रस्तुति , आदरणीय धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मित्र ! अब कुछ स्वास्थ्य-लाभ हुआ है सो आज ही अंतर्जाल की सुविधा उपलब्ध होते ही सब की सेवा में उपस्थित हूँ !
    गीत में छायावाद व भौगोलिक परिवेश एक साथ हैं ! मच्छी रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बारिश की दरकरार सबको है। .
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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