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बुधवार, 18 जून 2014

"बिन परखे क्या पता चलेगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हर सिक्के के दो पहलू हैं, उलट-पलटकर देख ज़रा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

हर पत्थर हीरा बन जाता, जब किस्मत नायाब हो,
मोती-माणिक पत्थर लगता, उतर गई जब आब हो,
इम्तिहान में पास हुआ वो, तपकर जिसका तन निखरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

नंगे हैं अपने हमाम में, नागर हों या बनचारी,
कपड़े ढकते ऐब सभी के, चाहे नर हों या नारी,
पोल-ढोल की खुल जाती तो, आता साफ नज़र चेहरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

गर्मी की ऋतु में सूखी थी, पेड़ों-पौधों की डाली,
बारिश के मौसम में, छा जाती झाड़ी में हरियाली,
पानी भरा हुआ गड्ढा भी, लगता सागर सा गहरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गंभीर बात कही है रचना में ,बिना परखे कोई भी भरोसा करना खुद को छलना है ,बहुत शानदार अभिव्यक्ति ,बहुत- बहुत बधाई आ० शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. परखना मत परखने से कोई रिश्ता नहीं रहता...

    उत्तर देंहटाएं
  3. रखना है धीरज हमें, देना है कुछ वक्त |
    शासक सारे एक से, करें फैसले शख्त |
    करें फैसले शख्त, फैसले लोक लुभावन |
    है असमंजस आज, सामने झंझट बावन |
    रविकर यूँ मत सोच, दर्द से जूझे टखना |
    बड़ी चुनौती आज, एक सरकार परखना ||

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. रविकर यूँ मत सोच, हमें अच्छे दिन चखना ||

      हटाएं
  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1648 में दिया गया है |

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर बात कही है :

    नंगे हैं अपने हमाम में, नागर हों या बनचारी,
    कपड़े ढकते ऐब सभी के, चाहे नर हों या नारी,
    पोल-ढोल की खुल जाती तो, आता साफ नज़र चेहरा।
    बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बिन परखे क्या पता चलेगा ......शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  7. परखना तो जरूरी है ही ...
    लाजवाब रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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