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शुक्रवार, 13 जून 2014

"आगत का स्वागत करने में, फूले नहीं समाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तपती गर्म दुपहरी में,
जो राहत सी दे जाते हैं।
पीताम्बर को धारण कर,
जीवन दर्शन सिखलाते हैं।।

जब सूरज आग उगलता है,
लू ने जब तन को झुलसाया।
सड़क किनारे खड़े तपस्वी,
देते फूलों की छाया।
अमलतास के पीले झूमर,
मन को बहुत लुभाते हैं।
पीताम्बर को धारण कर,
जीवन दर्शन सिखलाते हैं।।

किसके लिए बताओ तुमने
सज-धज कर सिंगार किया।
तुमको कंचन के गजरों का,
किसने ये उपहार दिया।
जनसेवा के अनुभाव तुम्हारे,
मन में कैसे आते हैं?
पीताम्बर को धारण कर,
जीवन दर्शन सिखलाते हैं।।

रामायण के नायक जैसे,
कर्तव्यों के स्वामी हो।
स्वार्थपरायण जग में तुम,
निस्वार्थ और निष्कामी हो।
आगत का स्वागत करने में,
फूले नहीं समाते हैं।
पीताम्बर को धारण कर,
जीवन दर्शन सिखलाते हैं।। 

7 टिप्‍पणियां:

  1. पीताम्बरी अमलतास का सजीव चित्रण बहुत सुन्दर दृश्य |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर रचना व प्रस्तुति , आ. धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  3. रस पूर्ण ...पूरा न्याय |

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय शास्त्री जी .. इन पेड़ों पौधों को इतना मान दे प्रकृति को अमरत्व दे दिया आप ने
    बहुत सुन्दर
    भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं

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