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रविवार, 29 जून 2014

"ग़ज़ल में फिर से रवानी आ गयी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हाथ में खोई निशानी आ गयी है
याद फिर भूली कहानी आ गयी है

वक़्त ने की थी शरारत कुछ मगर
अब हमें बिगड़ी बनानी आ गयी है

जंग हो कर जब सुलह हो जाये तो
समझ लो तब रुत सुहानी आ गयी है

फूल को छूना नहीं, लेना महक
अब बगीचे में जवानी आ गयी है

अब ज़माना रास फिर आने लगा
साथ जब संगत पुरानी आ गयी है

हो गया फिर से चमन गुलजार अब
मालियों को बागबानी आ गयी है

“रूप” की जब धूप आँगन में खिली
ग़ज़ल में फिर से रवानी आ गयी है 

4 टिप्‍पणियां:

  1. जंग हो करके जब सुलह हो जाये तो
    समझ लो तब रुत सुहानी आ गयी

    :) इंतजार है ।

    बहुत सुंदर ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुंदर रचना आदरणीय धन्यवाद ! ツ

    उत्तर देंहटाएं
  3. जंग हो कर जब सुलह हो जाये तो
    समझ लो तब रुत सुहानी आ गयी है ..
    बहुत ही लाजवाब शेर है ग़ज़ल का ... पूरी ग़ज़ल मुकम्मल ....

    उत्तर देंहटाएं

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